हिंदी भक्ति साहित्य में गुरु-शिष्य परंपरा: एक अध्ययन
मंगल मुण्डा¹, डॉ. रंजिता जेना²
¹शोधार्थी, हिंदी विभाग, कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, किस् मानित विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर 751024 ओडिशा, भारत; ²सहायक प्राध्यापिका, हिंदी विभाग, कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, किस् मानित विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर 751024 ओडिशा, भारत
Keywords
भक्ति साहित्य गुरु-शिष्य परंपरा निर्गुण भक्ति सगुण भक्ति आध्यात्मिक चेतनाAbstract
भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही वह परंपरा है जिसमें गुरु को अपना सम्पूर्ण ज्ञान शिष्य को प्रदान करने का प्रयत्न करते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा को अत्यंत प्राचीन और पूजनीय माना गया है। इतना ही नहीं भारतीय संस्कृति में तो गुरु को भगवान से ऊंचा स्थान प्राप्त है। वैदिक काल से लेकर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन तक गुरु की भूमिका आध्यात्मिक, जीवन-दृष्टा और सामाजिक चेतना के वाहक के रूप में विकसित का मूल आधार रहा है। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में गुरु-शिष्य की यह परंपरा केवल ज्ञान प्रदान की औपचारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्जागरण का सशक्त माध्यम के रूप में सामने उभरकर आती है। मध्यकालीन भारत में जब सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव और रूढ़ियां प्रबल थीं, तब भक्ति आंदोलन ने लोकभाषा में आध्यात्मिक अनुभवों को व्यक्त कर जन चेतना को नई दिशा दी। गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति की एक प्राचीन और पूजनीय परंपरा है, जो गुरु और शिष्य के बीच अद्वितीय संबंध को दर्शाती है। वैदिक काल से चली आ रही यह परंपरा आध्यात्मिक, कला, विज्ञान और दर्शन सहित विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान के प्रसार का आधार रही है। इस शोध आलेख में भक्ति साहित्य के निर्गुण और सगुण काव्य धाराओं में गुर-शिष्य परंपरा के स्वरूप, महत्व और सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।
Received: 24 July 2026, Accepted: 30 July 2026, Available online: 04 August 2026
Cite As
मंगल मुण्डा & डॉ. रंजिता जेना. (2026). हिंदी भक्ति साहित्य में गुरु-शिष्य परंपरा: एक अध्ययन. International Journal of Arts, Social Sciences and Humanities, 04(03), 42–45. https://doi.org/10.5281/zenodo.21788115
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